Monday, 8 July 2013

शिवदर्शन

कभी गूंजती थी जंहा बम भोले की जयकार
आज विराना हुआ वहां है तो बस लाशों की चीत्कार 
खंडर हुए आशियाने बिछड़े है न जाने कितने अपने 
सिसकियाँ दर्द समेटे अपने अंदर कर रही हाहाकार 

गाँव गाँव से शहर शहर से आये शिवदर्शन का सपना साकार 
लौटे तो लेकर आँखों में अपनों के लौटने का लेकर इंतजार 
देवभूमि को देखो आज समेटे लाशों का अम्बार
मरघट सा सन्नाटा लेकर देख रही कुदरत रुदर अवतार 

पथराई आँखें ग़मगीन दिल जीवन की कर रहे पुकार 
श्रधान्जली उतर्राखंड की उनको छोड़ गए जो ये संसार 

सैलाब कुदरत का

।।  घर से निकले दिल में शिव भक्ति 
होटों पे मुस्कान लिए 
सैलाब कुदरत का आया ऐसा 
ना जाने कितना गुम-नाम हुए 
कितनो की गोद उजाड़ गयी 
सूनी हुई सुहागनों की मांग 
बूढी आखें पथराई देखो साहारे का इंतज़ार लिए 
कभी चेह्कता था पहाड़ मेरा 
आज करुण क्रंदन ही गूँज रहा 
अलक नंदा उफन गयी 
प्रलये सा ऐलान लिए 
कैसे कहेंगे पुण्य कमाने को 
हमने चारो धाम किये 
विपदा ने मर है ऐसा 
खुशियों से अनजान किये 
सलाम उन जवानो को है मेरा 
जीवन बचाया औरो का जिसने 
हथेली पे अपनी जान लिए ।।

ज़ख़्मी पहा

ज़ख़्मी पहाड़ के रिसते घाव 
देख के रोये सारी कायनात 
क़यामत पे सियासत हो रही
हाय री किस्मत कैसे हालात
बसेरे उजड़े अपने बिछड़े 
लाचार किया तूने भोलेनाथ 
अश्रु भरी अंकों में आशा 
कहीं से आये कोई सौगात 
तांडव मौत का हुआ शिवनगरी में 
उजड़ी नगरी में बिछ रही राजनीति की बिसात 
जीवन नैया पार लगाने को 
कैसे आयेगी कोई सौगात 
क़यामत पे सियासत हो रही
हाय री किस्मत कैसे हालात