Wednesday, 21 September 2011
भूख
मैले कुचैले फटेहाल कपडों में अपनेअधनगें बदन को ढांपने की असफल कोशिश करती हुई असहाय गरीब महिला अपने दो छोटे छोटे बच्चों के साथ कचरेदान से कुछ बीनती हुई .. भूखसे बिलख रहे बच्चों को सांत्वना देती शायद इस कचरे के डब्बे से कुछ खाने को मिल जाये ताकि बच्चों की भूख शाँत कर सके ,
तभी रास्ते गुजरती भीड,जो कुछ नारे लगा रही थी, …जनलोकपाल लाऔ
भ्रष्टाचार भगाऔ …को देखकर कचरा बीनते हाथ ठहर से जाते हैं
बच्चे बडी मासूमियत से पूछते हैं मां क्या जनलोकपाल आने से
हमे खाना मिलेगा मां गहरी साँस लेकर जवाब देती …शायद मिल जाये
अगर ये बडे लोग उसकी भी कालाबाजारी नही कर देंगें तो
जवाब देकर वो फिर से कचरा बीनने मे मशगूल हो जाती है
क्योंकि उसे तो बस अपने मासूम बच्चों की पेट की आग
बुझानी है.
तभी रास्ते गुजरती भीड,जो कुछ नारे लगा रही थी, …जनलोकपाल लाऔ
भ्रष्टाचार भगाऔ …को देखकर कचरा बीनते हाथ ठहर से जाते हैं
बच्चे बडी मासूमियत से पूछते हैं मां क्या जनलोकपाल आने से
हमे खाना मिलेगा मां गहरी साँस लेकर जवाब देती …शायद मिल जाये
अगर ये बडे लोग उसकी भी कालाबाजारी नही कर देंगें तो
जवाब देकर वो फिर से कचरा बीनने मे मशगूल हो जाती है
क्योंकि उसे तो बस अपने मासूम बच्चों की पेट की आग
बुझानी है.
आज की फिल्मे विज्ञापन और हमारी युवा पीढी
आज के युवा देश का भविष्य, लेकिन हमारी युवा पीढी की मानसिकता पर आजकल की फिल्मे और गैरजरूरी विज्ञापन
कितना बुरा असर डाल रहे हैं ये सोचने का विषय है
कभी हमारे देश मे साफ सुथरी शिक्षाप्रद व मनोरजंक फिल्मो का निर्माण
होता था पर आजकल की फिल्मे परिवार के साथ देख पाना सभ्यता से परे होता जा रहा है
कुछ विज्ञापन उन उत्पादों के होते हैं जो छोटे बच्चों के ऐसे सवाल बनकर
सामने आ जाते हैं जिनका जवाब बडों के पास सिर झुका लेने अलावा कुछ नही होता व बालमन सिर्फ
असमजंस मे रह जाता है और युवाऔ के लिये हर तरह की पाबन्दी और डर से मुक्ति का साधन बन जाते हैं
कुछ विज्ञापन लोक सेवा आयोग दव्ारा जन हित मे प्रसारित होते हैं लेकिन क्या ये सच मे जनहित मे हैं या युवा पीढी के विनाश मे
आजकल जिस तरह हमारी युवा पीढी पश्चिमि सभ्यता मे रगंती जा
रही है उनके लिये तो इन विज्ञापनो मे दिखाये गये उत्पाद
हर तरह के डर से आजादी का साधन बन गये हैं इन उत्पादो के विज्ञापन प्रसारण के समय अगर परिवार एक साथ
बैठा हो तो शर्मिदंगी से सर झुक जाता है
एक विज्ञापन मे दिखाया जाता है कि अपने साथी के प्रति वफादार रहिये
समबन्ध 1 के साथ या फिर फंला उत्पाद के साथ मतलब
समबन्धो की नैतिकता समाप्त ,क्या हमारा सूचना प्रसारण मंत्रालय इस तरफ ध्यान ही नही देता
अगर मेरा ये सब लिखना कुछ अजीब व अनुचित लगे
तो मै क्षमाप्राथी हुँ ये मेरे अपने विचार हैं |
कितना बुरा असर डाल रहे हैं ये सोचने का विषय है
कभी हमारे देश मे साफ सुथरी शिक्षाप्रद व मनोरजंक फिल्मो का निर्माण
होता था पर आजकल की फिल्मे परिवार के साथ देख पाना सभ्यता से परे होता जा रहा है
कुछ विज्ञापन उन उत्पादों के होते हैं जो छोटे बच्चों के ऐसे सवाल बनकर
सामने आ जाते हैं जिनका जवाब बडों के पास सिर झुका लेने अलावा कुछ नही होता व बालमन सिर्फ
असमजंस मे रह जाता है और युवाऔ के लिये हर तरह की पाबन्दी और डर से मुक्ति का साधन बन जाते हैं
कुछ विज्ञापन लोक सेवा आयोग दव्ारा जन हित मे प्रसारित होते हैं लेकिन क्या ये सच मे जनहित मे हैं या युवा पीढी के विनाश मे
आजकल जिस तरह हमारी युवा पीढी पश्चिमि सभ्यता मे रगंती जा
रही है उनके लिये तो इन विज्ञापनो मे दिखाये गये उत्पाद
हर तरह के डर से आजादी का साधन बन गये हैं इन उत्पादो के विज्ञापन प्रसारण के समय अगर परिवार एक साथ
बैठा हो तो शर्मिदंगी से सर झुक जाता है
एक विज्ञापन मे दिखाया जाता है कि अपने साथी के प्रति वफादार रहिये
समबन्ध 1 के साथ या फिर फंला उत्पाद के साथ मतलब
समबन्धो की नैतिकता समाप्त ,क्या हमारा सूचना प्रसारण मंत्रालय इस तरफ ध्यान ही नही देता
अगर मेरा ये सब लिखना कुछ अजीब व अनुचित लगे
तो मै क्षमाप्राथी हुँ ये मेरे अपने विचार हैं |
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